तुम्हारे शहर की बस !

मै रोज सुबह जाता हूँ
तुम्हारे शहर की बस पकड़ने के लिए
पर कभी इसमें मेरे लिए जगह नहीं होती है
और तुम कह सकती हो
इसमें तुम्हारा क्या क़सूर ?

एक साथ !

मै जब-जब रोया
तुम भी रोई
मुझसे छिपकर
और मै जब-जब हँसा
तुम भी हँसी
जैसे धरती हंसती है
हरियाली देखकर
और इस तरह हमने
न जाने कितनी चीजें एक साथ की
जैसे विदा लेते समय
एक दूसरे को बार-बार निहारना
और कभी-कभी
एक दूसरे को देखकर यूँ ही मुस्कुराना !