नफ़रत के ख़यालात न रहे !

रचनाकार.ओर्ग पर प्रकाशित !

कह दो सब तुम मुझसे, दिल में तुम्हारे कोई बात न रहे
मिल जाओं मुझमे सहर सा तुम, फ़िर जीवन में कोई रात न रहे

यह सांसो के बंधन तुमसे, लगने लगे है मुझको छोटे
तुम मोक्ष बनो मै पा लूँ तुम्हें, फ़िर आँखों में कोई बरसात न रहे

कुछ न कहना फ़िर चुप रहना, पर्वत सी जो चुप है तू
मै राग बनूं तुम गा लो जी भर, फ़िर अधूरे कोई ज़ज्बात न रहे

तू धरती सी बन मै उगूँ तुझमे, हमारा इश्क़ बढ़े जैसे पारिजात
खुशबू बहे चहुओर यही, फ़िर नफ़रत के ख़यालात न रहे

मै ले चलूँ तुझको दूर तलक, इस जंगल से उस ओर कही
तू हवा सी बन बह चल मुझमे, फ़िर जहाँ को कुछ ज्ञात न रहे

कोई रिश्ता जला सा है !

शहर में हर तरफ़ धुँआ धुँआ सा है
ऐसा लगता कोई रिश्ता जला सा है

मै सोचता हूँ उठूँ मुहारा साफ़ करूँ
सूरज नहीं निकलने पर आमदा सा है

कश्तियाँ मजबूत है इरादा भी फ़ौलादी
साहिल ही मुझे डूबोने को लहरों से मिला सा है

ये कैसे मै अचानक खुशबुओं से भर गया
लगता है तेरा पल्लू मुझसे छुआ सा है

हर याद तेरी दिल में चुभी है खंजर सी
चेहरा तुझे पाने को फ़िर से रुआ’सा है

रचनाकाल : जून – २०१६

बन जाता है पायल देखो !

आँखों से जो बरस रहे तुम पहले यह बादल देखो
वक़्त ने उसको बना दिया यूँ ही कुछ घायल देखो

बेटी को तकलीफ़ में देखकर आँसू बहते रहते झर –झर
तब वह बाप सा नहीं रहता बन जाता है पागल देखो

उसको देख के बजने लगता अपने आप छन-छन
दिल जाने क्यूँ दिल नहीं रहता बन जाता है पायल देखो

कितना भी तुम बोलो उसे वह है अपनी वफ़ा में नहीं
‘मनीष’ वफ़ा में बन बैठा है अपना ही कायल देखो

यह बात देखिये !

इस दौर के बदलते हालात देखिये
अपने लिए भी सबके ख्यालात देखिये

कहने को जो रहते थे हमारे साथ सुबहोशाम
दूरियाँ उनसे हुयी कितनी दिन रात देखिये

दुनिया ज़रा से वक़्त में कितनी बेमानी हो गयी
ग़रीब के घर अब भी गिरवी परात देखिये

ऐसे भी लोग है जो लिखते बेटियों के दाम
बिगड़े हुए अमीरों की यह जात देखिये

बढ़ गया है सबमें बहुत बोलने का हुनर
‘मनीष’ चुप है क्यूँ यह बात देखिये

रचनाकाल : अगस्त – २०१५

सितम की इन्तिहाँ न कर !

मै ख़ुद ही मर जाऊँगा
तू सितम की इन्तिहाँ न कर

जब जा रहा है तो मत देख मुझे
फ़िर कोई हसरतें जवाँ न कर

कितना बोलेगा झूठ अपनों से ही तू
यह घर है इसे अभी बंजर मकाँ न कर

जो डूब गया है किसी और के इश्क़ में
उसको पाने की फ़िर से दुआ न कर

जो चाहता है तुझको ख़ुद से कही ज्यादा
कैसे भी करके बस उसको ख़फ़ा न कर

रचनाकाल : जून -२०१५

कोई जहर तो हो !

जो रूह को सकूं दे ऐसा कोई शजर तो हो
बस अमन के पैगाम बसे ऐसा कोई नगर तो हो

मै तेरे घर तक आ जाऊं बड़ी खुशमिजाजी से
जो सिर्फ़ मुझे ही दिखाई दे ऐसी कोई डगर तो हो

मै कब से तरस रहा हूँ रो रहूँ चाह भी रहा
एक मर्तबा तेरे होंठो पर मेरा कोई ज़िकर तो हो

मै झुक भी जाऊं और रोज तेरा करूँ सजदा
मुझे भी उठाने की तुझको कोई फ़िकर तो हो

ख़ुद पर यकीं लाने लगूं तुझे झूम के चूमूं
मेरी ज़िन्दगी तुझमे अब कोई सहर तो हो

मै तेरी बेवफ़ाई पर भी फ़ना हो जाऊं ‘मनीष’
बस तेरे हाथों से दिया कोई जहर तो हो

मेरा नाम बता दे !

तू अपनी मुश्किलों को मेरा नाम बता दे
मै हूँ बहुत ख़ाली मुझे कुछ काम बता दे

मै बहुत दूर तलक जाना चाहता तेरे साथ में
तेरी खवाहिश है क्या अपना अंजाम बता दे

मै टूट जाऊं तुझमें तुझी में हो जाऊं फ़ना
तू भी अपनी मोहब्बत का तो पैगाम बता दे

मैंने सीखे इबादत औ’ मोहब्बत के इतने सबक
यह मत सोचना तू कभी इतना कोई आम बता दे