प्रेम की भाषा

किसी बंजर सी ज़मीन पर
उगा कोई नन्हा सा पौधा
हमें सिखाता है प्रेम की भाषा
कि जब धूप में सूख चूका हो कोई
कैसे उसके चेहरे पर मुस्कान बनकर खिलों
और उसे दो जीने का नया सलीका
पर इस नन्हें से पौधे से हमने कितना सीखा ?

एक साथ !

मै जब-जब रोया
तुम भी रोई
मुझसे छिपकर
और मै जब-जब हँसा
तुम भी हँसी
जैसे धरती हंसती है
हरियाली देखकर
और इस तरह हमने
न जाने कितनी चीजें एक साथ की
जैसे विदा लेते समय
एक दूसरे को बार-बार निहारना
और कभी-कभी
एक दूसरे को देखकर यूँ ही मुस्कुराना !

प्रमाण

न जाने कितनी पीड़ा
न जाने कितना अंतर
न जाने कितना अकेलापन
और ख़त्म हो रहा है वजूद
पैर रास्ते से
अलग जाने की जिद में अड़े है
अपने ही साये
अब खंजर लिए खड़े हैं
खो रहे है मेरे शब्द
बौने हो चुके है इनके अर्थ
एक खाई सी बनती जा रही है
मेरे अंदर

सबको चाहिए प्रमाण
प्रेम का, अपनत्व का
घर के अन्दर भी
और बाहर की दुनिया को भी
तुम्हारें जरा सी खरोंच पर भी
मेरी ऑंखें डबडबा जाती है
पर शायद यह
तुम्हारे लिए प्रमाण नहीं है
ऐसी ही न जाने कितनी मुठभेड़ है
जो ख़ुद से हो जाती है
हर रोज
न जाने कितना अन्धकार भर गया है,
मुझमें-सच में
अब मेरे पास
मेरे वजूद का ही प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

प्रेम का सोता !

उसकी आँखों से बह रहे आँसू
मानो फूट गया कोई प्रेम का सोता
और मीठे पानी का झरना बन बह चला
पर आँसू तो खारे होते है ?
अरे वह है ही इतनी प्यारी
किसी भी खारी चीज को मीठा बना दे !

शब्द !

शब्द बड़े नहीं होते हैं
मानव की समझ होती है
जो शब्द को ब्रह्म बना देते है
जैसे मैंने लिखा स्नेह
सिर्फ तुम समझी
मैंने फ़िर लिखा प्रेम
और अब भी सिर्फ तुम ही समझी !

बंटवारे के बाद

बंटवारे से टूटे हुए घर में
और आंधी से टूटे हुए पेड़ में
कोई खास अंतर नहीं होता है
मैं तो कहता हूँ अंतर होता ही नहीं है
जैसे आंधी में ज़मीन से उखड़ कर जब कोई पेड़ गिरता है
तो लोग काट-काट कर बाँट लेते है
तना , जड़ और टहनियां
मतलब बंट जाता है पेड़ का हरेक हिस्सा
ठीक उसी तरह घर टूटने पर
आँगन में उठ जाती है एक दीवार
बंट जाते है स्नेह , आंसू , अपनापन
प्यार और गुस्सा

बंट जाता है बच्चों के खेलने का दायरा
रिश्तेदारों के बैठने की जगह , और भिखारी को मिलने वाली भीख
सिर्फ यही नहीं बूढ़ी दादी माँ की दवाओं का खर्चा भी
और ‘टामी’ को मिलने वाली रोटी का हिस्सा भी
ऑफिस से लौटते ही नहीं करती है नन्ही ‘बिटिया-रानी’ अपने ताऊ से शिकायत
कि ‘बड़े-पा’-‘बड़े-पा’ , मम्मी ने मुझे आज मारा है
ताऊ भी नहीं जाते एक प्यारा सा उलाहना लेकर बहू के पास यह कहने की
देखो भाई, मेरी ‘बिटिया-रानी’ को अब मारा तो ठीक नहीं होगा
मेरी एक ही तो ‘बिटिया-रानी’ है
और इसके बाद उसे गोद में उछालकर नहीं चूमते है प्यार से उसका माथा
बंट जाता है दीदी और बुआ के आने और रुकने का टाइम,
वें दो दिन बड़के के यहाँ और दो ही दिन छोटे के यहाँ खाती है खाना,
और जाते वक़्त दो जगह पूजी जाने लगती है “कोक्ष”(आंचल –पूजा ),
और मिलने लगती है दो फीकी सी साड़ियाँ ।

बंटवारे के बाद छोटी बहन और भाभी मिलकर,
नहीं करती है ठिठोली देवर से किसी ‘छायाचित्र’ का नाम लेकर,
रखा जाने लगता है उस पर हुए खर्चे का हिसाब,
और बेटियां नहीं कहती है चाचा से की ला दो मुझे किताब ।
पर , कुछ लोग आकर मुझसे कहते है,
कि बंटवारे के बाद बढ़ जाती है,
परिवारों में विकास की रफ़्तार ।
पर आप बताइए,
क्या होता है पेड़ का विकास ?
ज़मीन से अलग होने के बाद ।