इस उम्मीद … !

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पूरी रफ़्तार से चल रही ट्रेन के गेट पर खड़ी पत्नी ने पति से पूछा – मै इस ट्रेन से गिर जाऊं तो आप क्या करेंगे ? पास खड़े पति ने अख़बार का पन्ना पलटते हुए अनमने भाव से हंसकर कहा – समय आने पर देखा जायेगा !… और फ़िर पलटकर पति ने भी पत्नी से पूछा – अच्छा माना मै गिर जाऊं तो तुम क्या करोगी ? पत्नी ने पति को देखा और एक पल बिना सोचे मुस्कुराते हुए पति को बचाने के लिए ट्रेन से छलांग लगा दी ! यह पत्नी का उत्तर था !

कहने को महज़ यह एक लघु-कथा है ! कुछ बेशुमार बुद्धिमान लोगों को यह एक बेवकूफ़ी वाली बात भी लग सकती है ! पर असल में सीखने को इस कथा में प्यार , अपनत्व और त्याग की वह परिभाषा जो शायद हमारी उम्र पर बीत जाये पर हम कभी नहीं सीख पाए ! आप कह सकते है यह तो प्रेम का अतिवाद(माने बहुत ज्यादा- पागलपन वाला ) है कि कल्पना में किसी गिरे हुए पति को बचाने के लिए ट्रेन से छलांग लगा देना ! तो …

सूफ़ी संत रूमी लिखते है -अगर आप अतिवादी नहीं हैं, तो आप प्रेमी नहीं हो सकते। जो प्रेमी अतिवादी नहीं है, वह वास्तव में प्रेमी है ही नहीं। अगर कोई प्रेम को उसकी संपूर्ण तीव्रता में जानना-समझना चाहता है, तो उसे अतिवादी होना ही होगा। शांत और संयत किस्म का व्यक्ति कभी प्रेमी हो ही नहीं सकता। प्रेमी वही हो सकता है, जिसके भीतर जोश और जुनून सारी हदों को पार करता हुआ उमड़ रहा हो। बिना जुनून वाला प्रेम तो बेस्वाद और नीरस होता है। यह तो केवल एक लेन-देन है, एक-दूसरे की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए – प्रेम के नाम पर यही खेल खेला जाता है। अगर कोई अपनी परम प्रकृति तक पहुंचने के लिए अपनी भावनाओं को इस्तेमाल करना चाहता है, तो वे भावनाएं तीव्र होनी चाहिएं। साधारण भावनाएं आपको अपनी परम प्रकृति तक नहीं ले जा सकतीं।

खैर, इस प्रेम-ज्ञान की भयंकर बातों को छोड़कर जिनका इस socially-numb लोगों में कोई ख़ास मतलब भी नहीं  है ! मुद्दे की बात पर आते है ! WHO की रिपोर्ट बताती है हरेक साल पूरे विश्व में लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या करके अपनी जान दे देते है ! और अकेले अपने भारत में यही आकंडा हरेक साल कमोबेश डेढ़ लाख तक लोगों का है ! जिसमे लगभग चालीस हज़ार लोग फैमिली प्रॉब्लम की वजह से आत्महत्या करते है ! और NCRB- India के रिकॉर्ड के मुताबिक़ हरेक घंटे हिन्दुस्तान में एक स्टूडेंट आत्महत्या करता है यानी कमोबेश दस हज़ार स्टूडेंट प्रतिवर्ष !  और एक लाख महिलाओं में आत्महत्या करने के मामले में भारत विश्व में 6 रैंक पर है ! और यह आकड़ें बस जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है ! उन अनगिनत मामलों को छोड़कर जो न किसी के दिल में और न सरकारी कागज़ों में दर्ज ही नहीं हो पाते है !

मूल्यों , आदर्शों , परम्पराओं और फैमिली – वैल्यूज की दुहाई देने वाले भारत जैसे देश का जब यह हाल है तो बाक़ियों का क्या होगा आप समझ सकते है ! क्या वजह की कोई अपनी ज़िन्दगी ही ख़त्म कर लेता है ! अवसाद में था ! मेंटल वीक था ! प्यार में धोखा मिला होगा !  बैंकरप्सी हो गयी थी ! फ़ेल होने का डर था ! बस गिनी – चुनी इतनी ही वजह हम ज़रूरत से ज्यादा होशियार लोगों को समझ आती है ! हम कभी क्यूँ नहीं देख पाते है सिक्के का दूसरा पहलू ! और न देखना चाहते है कि जब अवसाद से शिकार किसी व्यक्ति को हमारी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी कि हम उससे बात करने के बजाय फेसबुकियाँ लोगों के साथ गोलगप्पे की दुकान ख़ोज रहे थे ! या इश्क़ में टूटे किसी बेटा/बेटी को समझने के बजाय हम उस पर चिल्ला रहे थे ! या फ़ेल/बैंकरप्सी में जी रहे किसी दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर यह कहने की बजाय की धैर्य रखो सब ठीक हो जायेगा हम उससे किनारा काटकर pout बनाकर किसी माल में सेल्फी खीच रहे थे ! और हा सनद रहे यहाँ मै आत्महत्या जैसे कृत्य को न तो वाज़िब मान रहा हूँ और न ही उसका समर्थन कर रहा हूँ !

एक्चुअली हमारी फ़ितरत ही यही है कि हमें बस अपना ही सब नज़र आता है ! अपना दुःख , अपना सुख ! बाकि किसी का कोई दर्द , शिकायत या तड़प हमारे लिए मायने नहीं रखती है ! लगभग घर-बाहर सभी जगह यही हाल है ! नवविवाहिता पर होने वालें जुल्म , बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार, अपने ही लोगों द्वारा मिलने वाली मानसिक प्रताड़ना ! शायद  घर-बाहर कही भी कोई किसी को समझने को तैयार नहीं है ! तो प्रश्न सिर्फ़ इतना ही है कि – जब कोई किसी को समझने के लिए तैयार ही नहीं है ! तो यह दुनियादारी क्यूँ ? गोलगप्पे खाने के लिए तो कोई भी मिल जायेगा किसी को भी रोड से पकड़ लो ! और हां आदमी भी गोलगप्पे खाने से निकले आसुओं को सच मानकर उसी के साथ हो लेता है ! जबकि शायद कोई जो उसे ढ़ंग से समझता है वह उसे कभी समझ ही नहीं पाता है ! यह कोई शिकायत नहीं है बस ढ़ोंग या दिखावा नहीं चाहिए !

एकांगी विचारधारा वाले लोग नहीं चाहिए ! वे पक्षी नहीं चाहिए जो पतझड़ में पेड़ छोड़कर उड़ जाते है ! वे कप्तान भी नहीं चाहिए जो डूबते जहाज को छोड़कर भाग जाते है ! और ऐसे किसी अपार्टमेन्ट में घर भी नहीं चाहिए कि जहाँ सेकंड फ्लोर पर प्यास से कोई मर रहा हो और थर्ड फ्लोर पर डीजे की तेज धुन में बियर पीते हुए लोग नागिन डांस कर रहे हो ! आप यहाँ मुझे क्रॉस कर सकते है कि कोई दूसरा क्या कर रहा उससे क्या लेना – देना है ! तो फ़िर मेरा प्रश्न वही है फ़िर यह सामाजिक संरचना जैसे भारी-भरकम शब्द क्यूँ बनाए गए है  ? आप यह भी कह सकते हो मेरी बहुत छोटी सोच है ! आपकी ख़ुशी होगी ! पर एक दिन जब कोई किसी को बात करने को नहीं मिलेगा ! तब दीवार पर सिर मारिएगा अपना और कहियेगा दूसरे से क्या लेना – देना !

शायद यह एंटी – सोशल है ! या बहुत ज्यादा अतिवादी ! या बहुत ज्यादा उम्मीद रखने वाला ! आपको जो भी समझना है आप अपने विवेक से समझ लीजिये ! पर socially – numb लोग नहीं चाहिए ! क्यूंकि हरेक आत्महत्या के बाद सिर्फ़ आदमी नहीं जाता है मानवता की वह सारी परिभाषाएं और मूल्य भी चले जाते है जो कहते है कि आदमी ही आदमी के काम आता है ! और अंतिम बात कोई आदमी आत्महत्या तब कर लेता है जब उसकी सामाजिक/परवारिक और सम्बन्धों की हत्या उसके अपने ही लोगों द्वारा पहले ही कर दी जाती है ! हो सके तो ऐसा होने से रोकिए ! स्वस्थ रहे – मस्त रहे !

आख़िर में –
मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
(प्रो. वसीम बरेलवी)

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