भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मूल्याङ्कन

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रचनाकार.ओर्ग पर प्रकाशित !

कहानी में हमेशा तीन पक्ष होते है – पक्ष , विपक्ष और सत्य ! इतिहास मनाव को अतीत की वास्तविकताओं का दर्शन कराता है , वैसे भी इतिहास का शाब्दिक अर्थ भी है – “ऐसा ही था ” या “ऐसा ही हुआ ”! भारतीय शिक्षा के इतिहास को मुख्यतः हम पांच भागों में बाँट सकते है !
1- वैदिक काल/Vedic Period – छह सौ ईसा पूर्व
2- बुद्ध काल/Buddhist Period – सन 600 से 1200 तक
3- मुस्लिम काल/Muslim Period – सन 1200 से 1800 तक
4- ब्रिटिश काल/British Period – सन 1800 से 1947 तक
5- स्वतंत्रोतर काल/After Independence Period – सन 1947 से अबतक

वैदिक काल की शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो इसमें व्यक्ति के अध्यात्मिक उन्नति पर ज्यादा जोर दिया जाता था ! शिक्षण काल में छात्र को सामाजिकता , विनम्रता , भद्रता , सहन-शीलता , सहकारिता आदि का पाठ काफी बेहतर ढंग से सिखाया जाता था ! “भिक्षाटन द्वारा छात्रों को विनय का पाठ पढ़ाना” , संभवतः विश्व इतिहास का एकमात्र दुर्लभतम उदहारण है !

उसके बाद आयी बुद्ध काल की शिक्षा प्रणाली वैदिक काल से मात्र इतना भिन्न थी कि इसमें अध्यात्मिक उन्नति पर ज्यादा जोर न देकर नैतिकता तथा शील पर ज्यादा जोर दिया गया ! नैतिक चरित्र के साथ दैनिक जीवन में मधुर व्यवहार , अच्छा आचरण , निष्ठा छात्रों को ढंग से सिखया जाता था ! नालंदा (सन 425 से सन 1205 ) बुद्ध काल की शिक्षा का गौरव रहा !

फिर उसके बाद मुस्लिम काल में मुस्लिम संस्कृति के आधार पर अरबी , फारसी और बाद में उर्दू की शिक्षा दी गयी ! यह काल medieval period के नाम से भी जाना गया !

मुग़ल वंश का अंत होते – होते अंग्रेजी हुकूमत चलने लगी ! और भारतीय शिक्षा अब अंग्रेजो के हाथ में चली गयी !
1835 में लार्ड टी . बी . मैकाले साहब आये और उन्होंने कहा की –
“A single shelf of a good European library was worth of the whole native literature of India & Arabia ”.
अब चूंकि हम भारतीयों के लिए अंग्रेजी में लिखा परचून की दूकान का हिसाब भी बड़ा साहित्य होता है ! अच्छा अंग्रेजी से हम सबका रिश्ता भी हमेशा सौतेली माँ वाला रहा ! प्यार पाना चाहा तो बहुत , मगर मिला नहीं ! लेकिन फिर भी मैकाले साहब का स्टेटमेंट सुनते ही हम सब , अपने भारतीय ज्ञान को गंवार , निष्कृष्ट और विज्ञान विहीन बताकर/समझकर हम वैज्ञानिक बनने चल पड़े !
साफ़ शब्दों में कहूँ तो उनकी फैक्ट्री में मजदूर बनने भर की शिक्षा लेने लगे ! और यही से एक अजीब सी मानसिक गुलामी का दौर शुरू हो गया !

खैर , काफी संघर्षों के बाद 1947 में हमें अंग्रेजों की हुकूमत से तो आजादी मिली , पर मानसिक गुलामी से आजादी नहीं मिली !
शिक्षा व्यवस्था में ताबड़तोड़ बदलाव किये गए ! जहाँ लिखना था –
“नवगति , नवलय , ताल छन्द नव
नवल कंठ , नव जलद मंद्र रव
नव नभ के नव विहंग वृन्द को
नव पर , नव स्वर दे ! ( महाप्राण निराला ) ”
वहां – “jhony – jhony ! yes papa , eating sugar no papa !” लिखा गया ! यह आँख मूंदकर दूसरों को ही सही मानने और अपने / अपनों पर भरोसा न होने का नायाब नमूना था (है) !

नतीजा , यह हुआ की शिक्षा व्यवस्था जन-मानस से कटती गयी ! नकली ज्ञान केंद्र (कोचिंग – सेण्टर ) , हरेक नुक्कड़ पर पान की ढाबली की तरह खुले निजी पब्लिक/कान्वेंट स्कूल , जिनमे न अच्छे अध्यापक है न अच्छी सुविधाएँ शिक्षा व्यवस्था का बेडा-गर्क करने पर तुलें है ! एक बात यह भी है की जो लोग “हाई-मोस्ट” फीस लेने के बाद अपने ही नन्हें बच्चों के यूनिफार्म से लेकर कॉपी-पेंसिल में भी कमीशन खाते हो ! वह भला कौन सी शिक्षा देंगे आप बेहतर समझ सकतें है (?)!

सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है ! मध्यान्ह भोजन , फंडामेंटल राईट ऑफ़ एजुकेशन , फ्री एजुकेशन , छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएँ यहाँ बस मजाक बनकर रह गयी है ! और सही भी प्रत्येक छात्र को सिर्फ चार रुपयें में कोई अध्यापक कैसे २०० मिली . मिल्क और तहरी उपलब्ध कराएँ ? अध्यापक को सरकार हमेशा गैर – शैक्षणिक कार्यों में ही जोते रहेगी तो वह पढ़ाएंगे कब ? महिला अध्यापिकाओं की जरूरतें और सुरक्षा पूरी करने में प्रदेश / देश की सरकार बिलकुल ही असमर्थ है ! महिला अध्यापिका की कमी के कारण ही 11 वर्ष से 17 वर्ष की अधिकांश लड़कियां घर पर रोक ली जाती है ! इस तरह सेकेंडरी/हायर एजुकेशन में बहुत कम लड़कियां ही पहुच पाती है , खासकर , गाँव की बच्चियों की शिक्षा तो रुक ही जाती है ! तो कुल मिलकर टोटल गेन यहाँ भी “निल-बटे-सन्नाटा” ही है !

देश में लगभग 16000 अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान है जिनकी स्थिति दयनीय है ! सरकारी विद्यालयों में 25 % से भी अधिक अध्यापक प्रतिदिन अनुपस्थित रहते है ! यह भी ख़राब शिक्षा का एक प्रमुख कारण है ! शिक्षक को भी अपना मूल्यांकन करने की जरुरत है ! महाभारत में कहा गया है कि –“गुरुगुर्रुत्मो धाम:” यानी गुरु मनुष्यत्व से देवत्व की ओर ले जाता है ! तो महज ‘छात्र सुनते ही नहीं’ कहने से आपके कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाएगी ! हमारी संस्कृति में सम्मान जनरल स्टोर पर नहीं मिलता , उसे अर्जित करना पड़ता है ! शिक्षक को छात्र से सम्मान चाहिए तो पहले उसे अपनी आचरण की शुद्धता का उदहारण रखना होगा ! समय के पाबंद , विद्वान , विनम्र और अनुशासित शिक्षक की अवहेलना छात्र कर ही नहीं सकता है !

चिली(96.2% लिटरेसी-रेट),मलेशिया (95%),श्रीलंका (91%) जैसे छोटे विकासशील देश जब अपने शिक्षा बजट को बढ़ाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था सुधार सकतें है ! तो आखिर हमारी सरकारें क्यूँ इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती है ? और समाज भी जो हरेक मुद्दें पर सड़क पर उतर आता है ! आखिर कब गुणवत्ता वाली शिक्षा , समान शिक्षा के लिए एकजूट और जागरूक होकर आवाज उठाएगा ! हमें(समाज) खुद भी अपने चरित्र पर सोचने की जरुरत है !

एक छोटा सा ईमानदारी से किया गया प्रयास (टीचर + गवर्नमेंट + पेरेंट्स द्वारा) प्राइमरी / सेकेंडरी एजुकेशन सिस्टम को सुधार सकता है ! हायर एजुकेशन में तो कॉलेज अपने बलबूते पर ही बहुत कुछ अच्छा कर सकता है ! बस इनके प्रोफेसर को डिपार्टमेंटल पॉलिटिक्स और स्टूडेंट्स को क्लास पॉलिटिक्स कम करना होगा ! लेकिन ??? बस इतना ही कहना चाहूँगा –“खुद को जख्मी कर रहें है , गैर के धोखे में लोग …..!”

यहाँ हमें शिक्षा में भौतिक उन्नति के साथ – साथ अध्यात्मिक उन्नति पर भी बल देना होगा ! जिससे छात्र चरित्रवान , स्वस्थ्य और धैर्यवान बने ! छात्र नफरत , घृणा , बैर , अहंकार , और आत्महत्या की तरफ जाने के बजाय प्रेम , सृजन , कल्याण का चयन करें ! एक ऐसी शिक्षा प्रणाली जिसमे छात्र को टारगेट अचीव करने वाला निर्जीव रोबोट न बनाकर !मेहनत , प्रेम और करुणा रखने वाली मानवीय आत्मा समझा जाये ! जहां केवल उनकी उपलब्धियों से नहीं , उनकी मानवता से भी उनकी क़द्र हो !

आँख मूंदकर विदेशी विचारों को छात्रों पर आरोपित न किया जाये ! हमें अपनी आंतरिक स्थिथि का ठीक से जायजा लेकर अपनी पुस्तकों को समाज से जोड़ना होगा ! कुछ याथार्थ चिंतन शामिल करने होंगे अपने पाठ्यक्रम में ! जिससे छात्र अपने अतीत , वर्तमान और भविष्य से जुड़ सकें उनको जान सकें ! बापू ने कहा है – “संवेदना विहीन विज्ञान सामाजिक पाप है !” और विनोवा ने भी कहा है की –“वह ज्ञान जिसमे आप अपनों के साथ हंस न सकें , उनके दुखों को न महसूस न कर पाए ! अज्ञान से भी बदतर होता है !”

बिना तर्क की कसौटी पर कसे ही अपने भारतीय ज्ञान ,विचार ,पद्धति को नकार देना कोई होशियारी नहीं है ! एनसीआर में रह रहे आपके भाई के बच्चें या आपका ही बेटा / बेटी आपको गाँव से आया आश्रित और पुराने ख्यालात का आदमी समझे ! पोस्ट – ग्रेजुएशन कर रहे लोग एक-दुसरें के लिए अथाह नफरत लेकर जीते हों ! और जब प्यार , सवेंदानाएं , अपनापन सब कुछ “सेलेक्टिव ” हो जाये , साधारण शब्दों में कहूं तो बनावटी और फर्जी हो जाये ! तो शिक्षा का फायदा क्या है ??? और आप लोग ज्ञान के विकास का दंभ पाले बैठे रहो !

कथा है की – एक बार , एक शिष्य ने अपने गुरु से पूंछा की – गुरुवर आप सारे संसार को मेहनत का सन्देश देते है ! करुणा का सन्देश देते है ! प्रेम का सन्देश देते है ! इससे क्या लाभ है ? गुरु ने शिष्य के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया ,बल्कि शिष्य का हाथ थामा और एक ऐसी जगह ले गया जहा दूर – दूर तक केवल रेत ही रेत बिखरी पड़ी थी ! गुरु ने शिष्य से कहा – पुत्र , आज शाम तक तुम इस रेत से एक प्रतिमा (मूर्ति) बनाकर आश्रम ले आना फिर मै बताऊंगा की मै पूरी दुनिया को मेहनत , प्रेम और करुणा का सन्देश क्यूँ देता हूँ ?

शिष्य प्रतिमा बनाने में जुट गया ! वह बार – बार रेत को इक्कठा करके प्रतिमा बनाने की कोशिश करता पर रेत बार – बार बिखर जाती ! ऐसा करते – करते उसके माथे पर पसीने की कुछ बूंदे आ गयी ! आज्ञाकारी शिष्य था , सोचा की गुरुवर के आदेश का पालन नहीं कर पाया हूँ ! तो आँखों में आँसू भी आ गये ! पसीने की बूँद और आँखों के आँसू जब हथेली पर गिरे तो हाथों में लगी रेत कुछ गीली हो गयी !

शिष्य समझदार था वह गुरु के पास अपने प्रश्न का उत्तर जानने नहीं गया , बल्कि दुनिया वालों के पास गया और कहा की – हमारा जीवन एक सूखी मिट्टी की तरह है ! अगर इसमें माथे पर मेहनत के पसीने की बूंदे नहीं , आँखों में करुणा के आँसू नहीं , ह्रदय में प्यार की छलकन नहीं तो बाकी सब कुछ होते हुए भी यह बेकार है !

आप भी इस कथा का मर्म समझिये और अपने बच्चो को भी समझिए ! यही असली शिक्षा के मायने है और शिक्षित-जीवन का सत्य !
आखिर में-
कविता शब्दों की अदालत में !
अपराधियों के कटघरे में !
खड़े किसी निर्दोष आदमी का हलफ़नामा है !!(धूमिल)

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