प्रेम न जानत कोय !

love

रचनकार.ओर्ग पर प्रकाशित !

क्या लिखूँ ? वह भी प्रेम पर ! जिस पर न जाने कितने वर्षों से , न जाने कितने लोगों ने , न जाने कितना कुछ नहीं लिखा ! संत-असंत , नर-नारी , ज्ञानी-अज्ञानी ,ज्ञात-अज्ञात ,जन्मा-अजन्मा सबने तो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से प्रेम का दर्शन कराया !

फिर चाहे मीरज़ापुर की कजरी हो -” अरे रामा पेंग बढ़ावें राधा प्यारी , पिया को लागी प्यारी री होरी !” या फिर बहराइच का लोकगीत -” अमावू बौरी -बौरी आवें ,बसावू बासुरी बजावें ,जियरा डोलि-डोलि जाय !” या फिर पूरे अवध में होली में गया जाने वाला फाग हो -“समय पर फगुवा खेलें भवानी ….!”

या सूरदास का वात्सल्य का शिखरस्थ पद – “जसोदा हरि पालनैं झुलावै , हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कुछ गावै ! ” या फिर मीराबाई का अथाह वियोग में डूबा पद – ” हेरी म्हां दरदे दिवाणी , म्हरा दरद न जाण्यां कोय ! ” या रसखान का भक्ति का सर्वोच्च पद -” काग के भाग बड़े सजनी , हरि हाथ से ले ग्यो माखन रोटी !’ इन सब में तो प्रेम का अनूठा अहसास छुपा है !

फिर क्या कारण है कि आज प्रेम महज एक मजाक का विषय बन कर रह गया है ! कबीर ने जिस ढाई आखर वालें प्रेम को जानने वालों को ‘पंडित’ कहा ! आज वह प्रेम परिजनों से विद्रोह से शुरू होकर ,खाप पंचायतों के रास्ते हॉनर किलिंग में बदल जाता है ! या फिर कोर्ट-मैरिज के रास्ते से डाइवोर्स , सुसाइड , एसिड-अटैक , MMS के रूप में दुनिया के सामने आता है !

वजहें गिनाने को तो बहुत हो सकती है पर हमे अनुभव(experience) और अनुभूति(realization) में फर्क सीखना होगा ! अनुभव के आधार पर आप कह सकते है कि सिंगल-फैमिली , पेरेंट्स के झगड़े , उनका बिजी शेड्यूल और संसधानो का इतना सुलभ होना इस “आज कोई-कल कोई और” वाले प्रेम का जिम्मेदार है ! पर अनुभूति के आधार पर मै कह सकता हूँ – हमारी पीढ़ी के सामने महज दूषित-प्रेम की परिभाषाये प्रस्तुत की गयी ! नतीजा हमने ‘दैहिक -प्रपंचो ‘ मे ‘वास्तविक -प्रेम ‘ खो दिया ! ठीक उसी तरह जैसे हमने ज्ञान मे से प्रज्ञा खो दी , और सूचनाओं में से ज्ञान खो दिया !

हम अपने को और अपने लोगों को प्रेम के उच्चतम आदर्शो जैसे -राम ,कृष्ण,नानक ,बुद्ध ,महावीर आदि के बारे में कभी सीखा ही नहीं पाये ! राम मर्यादा के प्रतीक पुरुष है और गंगा भारतीय अस्मिता की ! और कृष्ण जो सबको दीवाना बनाते है ! चक्र धारी होने पर भी कृष्ण का नाम लेने पर बासुरी नज़र आती है ! वही है जिनके पास मीरा भी है ,और महाप्रभु चैतन्य भी ! और जो माँ यसोदा के साथ वात्सल्य की वह अनुपम बाल लीला रचते है ! जो नास्तिको को भी सम्मोहित कर दे ! और जो राधा के साथ ऐसा मोहक संसार रचते है कि याद ही नहीं रह जाता है कि राधा आयु में उनसे बड़ी है और उनकी संबंधी भी है ! यहप्रेम का सच्चा स्वरूप है !

आज जब लड़को को उनकी सातवी गर्लफ्रेंड के चौथे बर्थडे पर उसकी ही कजिन से सेटिंग बनाते देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या वाकई प्रेम अँधा ही होता है ? या Francis Bacon साहब ने सही ही लिखा है “it is impossible to love, and to be wise.(from ‘of-love’ essay) !” प्रगति की अंधी दौड़ ,पश्चिमी देशों के अंध–अनुकरण और फिल्म-मेकर ने हमसे हमारे मूल्य ही छीन लिए ! हमें समझाना होगा की यह रोज-डे ,पर्पस-डे ,चॉकलेट-डे आदि -आदि उन लोगो द्वारा फैलाये गए चोचले है जो जो नकली गुलाबों , चॉकलेट ,टेडी-बियर ,और बियर का धंधा करते है ! यहाँ मै एक बात और कहना चाहूंगा की अभिभावकों को भी अपना स्व-मूल्याङ्कन करने की जरुरत है !

पर पीवीआर में बैठकर चवन्नी का चॉकलेट खाने वालें प्रेमी-युगलों कभी तुम्हे ग्रैंड -मस्ती ,हंटर ,या क्या सुपर कूल है हम-३ जैसी फ़िल्में देखने से फुरसत मिले या फेसबुक पर अपनी तथाकथित प्रेमी/प्रेमिकाओं से चैटियाते-चैटियाते बोर हो जाओ तो गूगल बाबा की शरण में जाकर जय शंकर प्रसाद की कहानी ” पुरूस्कार” या चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी ‘ की कहानी “उसने कहा था ” पढ़ लेना ! और गर समझ भी गए तो तुम्हारे दिमाग से ये ‘लाइन मारना ‘,’सेटिंग बनाना ‘ या ‘ बड़ा कंटॉप माल है ‘ जैसे शब्द हमेशा के लिए फॉर्मेट हो जायेंगे ! तब तुम्हे पता चलेगा आखिर प्रेम होता क्या है !

प्रेम के उन मूल्यों को खोजिए जिसमे ठहराव , भरोसा , संयम और चरित्र हो ! आपका प्रेम न तो इतना हल्का होना चाहिए की बीबी , बहन या गर्लफ्रेंड का फ़ोन बिजी जाने पर टूटने लगे ! और न ही इतना सस्ता की उसमे हर कोई आ जाये ! प्रेम सत्य ,सहज,सरल और जन- कल्याणकारी होना चाहिए !

कथा है की – एक राजकुमार ने बलपूर्वक किसी दूसरे देश के राजा को हराकर उसकी बेटी(राजकुमारी) का हरण कर उसे रानी बना लिया ! राजकुमारी ने कहा -राजकुमार ! तूने बल से मेरा तन भले ही हरण कर लिया हो ,पर तू मेरी आत्मा कभी नहीं जीत पायेगा ! राजकुमार ने उस दिन प्रण लिया , और अपना कोई दूसरा विवाह नहीं किया ! नहीं राजकुमारी को कभी हाथ लगाया , वो दोनों शयन -कक्ष में जब सोतें तो राजकुमार मध्य में अपनी तलवार रख देते ! और लगभग ६० वर्ष बाद एक दिन रानी ने वह तलवार उठकर फेंक दी ! और राजन से कहा – प्रिये ! आपके संयम ने मेरी आत्मा जीत ली ! चलो , आज मै आपकी अर्धनगिनी बनकर आपके साथ यज्ञ करुँगी ! और दोनों ने साथ में हवन -पूजन किया , और उसी दिन राजन ने वैराग्य धारण कर लिया !

कहने को तो यह महज एक पौराणिक कथा है पर सीखने में शायद आपका जीवन बीत जाये और आप इस कथा का मर्म न समझ पाएं ! सोचिये , कोशिश कीजिये ,अच्छा करने की ,अच्छा बनाने की ,और अच्छे लोगों चुनने की !
आखिर में –
प्रेम धर्म का पर्याय है !
प्रेम असीम है ,अनंत है !
बंधन – मुक्त
एक छोर से दूसरे छोर तक
अतृप्त मानवता
छोर की तलाश में प्रयासरत है !
तलाश रही है उस छोर को
जहा आदि और अंत का एक रूप है ! (अज्ञात)

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