उधेड़बुन …

love1कितनी उधेड़बुन है ! वक़्त और रिश्ते मुट्ठी में ली गयी रेत के मानिन्द हो गए है ! आप अगर मुट्ठी खोल देते है तब भी रेत रुकने वाली नहीं है और अगर बंद करते है तब भी ! और सब आपके ही सामने ही जायेंगे आप बस रास्ते की तरह देखते रह जायेंगे ! यह शायद क़िस्मत ही होगी ! हम कितना कुछ सीखते है ! तरह – तरह की भाषाएँ , तकनीकी , फैशन , सब्जेक्ट और न जाने कितना कुछ ! पर नहीं सीख पाते है प्रेम की भाषा ! दरअसल जब हमने प्यार की परिभाषा सीखी तब हमने अपनी आँखे बंद कर ली ! और फ़िर एक जैसे चार लोगों ने आँखे बंद करके हाथी को छुआ ! किसी ने टांग पकड़ी और किसी ने कान ! किसी ने पूरा हाथी देखा ही नहीं ! और सबने हाथी के आकार की अलगअलग व्याख्या दी ! ठीक ऐसे ही हमने प्यार की परिभाषा सीखी !

सिर्फ़ समाज का ही दोष ही नहीं है ! सच है समाज ने आदमियों को बन्दर बना रखा है ! और ख़ुद मादरी बन  बैठा है ! पर हमारी ख़ुद की भी गलतियाँ है ! अफ़सोस तब होता है जब आदमियत की बड़ी – बड़ी बात करने वाले लोग सामान्य बात प्रेम को समझ ही नहीं पाते है ! जाति से लेकर रंग – रूप और सबसे महत्वपूर्ण पैसा सब कुछ देखकर ही प्रेम होता है अब ! दरअसल हम लॉजिक(तर्क) के युग में जी रहे है ! हमें हरेक चीज में लॉजिक चाहिए ! मसलन कोई आपको बेइंतिहा मानसम्मान देता है ! तो आप उसमे लॉजिक खोजने लगते है कि उसे भी आप से कुछ रीटर्न चाहिए ! अब हरेक चीज में लॉजिक होना ज़रूरी भी नहीं है ! और इसी लॉजिक के चक्कर में हम हर मूल चीज को खोते जा रहे है !

वह जिन्हें तर्क नहीं आता है ! और कैलकुलेशन – मैनीपुलेशन – मॉडिफिकेशन भी नहीं आता है ! और दुनियादारी की बिल्कुल समझ नहीं है ! उनके आसूओं को तो पढ़ सकते हो ! या देख सकते हो उनकी उलझी हुई बेचैन साँसे जैसे मानो समुन्दर की लहरों में फंसी हो कोई जर्जर नाव ! सिर्फ़ इसीलिए न की तुम जाने को बोल दिए हो ! अगर सच में – Actions speak louder than wordsहै तो कभी छुकर देखो न उन हाथों को जो कुछ बोलते ही नहीं पर सब कुछ करना चाहते है आपके लिए ! पर शायद दुनिया बहुत जल्दी में है यहाँ किसी को टाइम नहीं कुछ सोचने का ! बस कोई आये या जाये ! क्या फर्क है ? सिर्फ़ एकांगी विचार सीखें है हमने ! मसलन वह बुरा है ! तो सब बुरा है ! वह अच्छा है तो सब अच्छा है ! किसी चीज के दो पहलू होते है ! बुरे – अच्छे से परे एक चीज होती है दशा ! एक वक़्त पर किसी की दशा जानने की कोशिश भी करनी चाहिए !

वह शायद प्रेम ही जिससे आपका तोता आपके घर में आते ही आपका नाम पुकारने लगता है ! और आपका कुत्ता आपके आगे – पीछे घूमने लगता है ! दोनों बेजुबान है पर दोनों को प्रेम की समझ है ! उन्हें भाषा भी नहीं आती है पर उनका action – louder है की वें आपसे प्रेम करते है ! पर आपके पास भाषा भी है ! और जुबान भी ! फ़िर भी आपका न action है न ही भाषा के बोल !…अच्छा छोड़ो न ! जाने दो ! तर्क से अलग , प्रश्नों से परे कही दूर चले जाओं ! जहा सिर्फ़ तितलियाँ और फूल हो ! नदियाँ हो ! पहाड़ हो ! झरने हो ! और एक शिवालय हो जिसमे बैठा हो कोई पुजारी ! जो शायद अहसास दिला पाए की उम्र तो एक पत्थर से प्रेम करके भी काटी जा सकती है ! और कोई साधारण प्रेम भी नहीं ! प्रेम इतना की ‘अविनाशी-शिव’ ही आन बसे तुम्हारे सालिग्राम में ! शायद यही प्रेम की भाषा है !

आख़िर में –
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये
आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये
– मुनव्वर राना

… आज़ादी ?

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रूसो लिखते है – “मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ किन्तु वह सर्वत्र बंधनों से जकड़ा हुआ है” ! सच है कि सामाजिक-परवारिक दायित्वों का निर्वहन करता हुआ एक मनुष्य न जाने कितने जाने – अन्जाने बन्धनों में बंध जाता है ! और शायद यही वजह हो सकती है कि सदियों से चली आ रही परम्पराएँ नहीं टूट रही है ! निसंदेह कुछ परम्पराएँ अच्छी है ! पर क्या सब ?

विकास की अंधाधुंध दौड़ चल रही है ! और इतनी तेज कि – अन्न का अन्न्तव चला गया ! वायु की आद्रता चली गयी ! जल की शीतलता चली गयी ! मानव की मानवता चली गयी ! हम विकसित हो गए ! और कुछ विकासशील जल्द ही विकसित होने की कतार में है ! एक दिन सब विकसित हो जायेंगे ! धरती का हरेक कोना विकसित हो जाएगा ! और यह विकास ऐसा होगा जहाँ सब पत्थर होगा ! खेत-खलिहान , घर-आगंन और आदमी सब पत्थर के होंगे !

पर क्या घर में बिजली का कनेक्शन आ जाना भर ही विकास है ? बहुत ज़रूरी है घर को रौशनी से भर देना ! गृहस्थ जीवन में सभी सुविधाएँ होना या जुटा पाना बहुत ज्यादा ज़रूरी है ! मै मानता हूँ ! पर उस दिल का क्या जो सदियों से अन्धकार में भरा हुआ ! उसमे उजाला किस सदी में होगा ? हज़ार वर्षो पहले जुए के खेल में अपमानित किया गया था किसी स्त्री को , और छोड़ दी गयी थी कोई , या जला दी जाती थी स्त्रियाँ ! अब हज़ार वर्षों के बाद इतना विकसित होने पर कितनी चीज़ें बदली है ? अब भी तो जला दी जाती है स्त्रियाँ !

वह सोच जो दमनात्मक है ! वह जो दूसरों को अपमानित करती है ! वह जो दूसरों को समान अधिकार देने से वंचित रखती है ! उस सोच में कितना बदलाव हुआ है ? दाल में नमक कम होने से लेकर , खाने में जरा सा लेट होने पर या छोटी-छोटी बातों पर घर – घर में होने वाला महाभारत ! क्या विकास हुआ है ? कितना अधिकार दे पाए हम अपनी बेटियों को – की 25 वर्ष के बाद पढ़ी – लिखी बेटी भी अपने ही घर में बोझ मानी जाने लगती है ! और छोड़िये न सिर्फ़ बेटी ही क्यूँ – अगर बेटा भी अपनी मर्जी से एक जीवनसाथी चुन ले तो कितना देर लगती है माँ’ओं को राजमाता शिवगामी बनने में ! किस लोकतंत्र और किस आज़ादी के लिए हम कैंडल मार्च करते है ? जो हमारे अपने ही खून में नहीं है ! समस्या यह नहीं की मै बस सबके ख़िलाफ ही हूँ ! या मै हरेक प्रचलित तौर-तरीक़े को ग़लत कहना चाह रहा हूँ ! मकसद सिर्फ़ इतना जानना है कि कितनी बोलने की आज़ादी है घर में ही ?

सदियों से चली आ रही सड़ी हुई जाति-प्रथा और उस पर नफ़रतों से भरी हुई दलीलें ! क्या विकास हुआ ? और किस चीज की आज़ादी ! कथा है – नेता जी बोस अपनी फ़ौज के साथ किसी मंदिर में दर्शन करने गए ! तो उनके मुस्लिम साथियों को रोका गया ! नेता जी ने कहा – फ़िर मै भी नहीं जाऊंगा अन्दर ! खैर फ़िर सबको जाने की अनुमति मिली ! जब दर्शन करके नेता जी बाहर निकले तो उन्होंने अपने माथे पर लगा टीका पोंछ दिया ! किसी ने पूछा – नेता जी आपने ऐसा क्यूँ किया ? नेता जी ने कहा – अगर सबने अपना – अपना धर्म अपने माथे पर चढ़ा लिया तो यह देश आज़ाद होने से पहले ही बंट जायेगा ! हुआ क्या ? यही तो !

फ़िर चाहे समाज हो या परिवार किस जगह पर हमारी सोच बदली ? दहेज़ की बात छोड़ दीजिये ख़ूब दहेज़ लेने के बाद कल्पना कीजिए की एक नवयुवक जिसकी पत्नी के भाई – बहन नहीं है ! और उस पत्नी की बीमार माँ अकेले अपने घर में एक गिलास पानी तक को मोहताज हो ! किस एक बन्दे में इतनी हिम्मत है जो यह अपने घर में अपने माँ-बाप से कह पाए की शालिनी(काल्पनिक) की मम्मी को यहाँ बुला लेते है रहने के लिए वह जब इतनी बीमार है ! और अगर मान लिया (जबकि मानना मुश्किल है) कि उसने कह भी दिया तो कितने माँ –बाप में इतनी कुव्वत है कि वह अपनी पुत्रवधु की बीमार माँ को अपने घर में कितने दिन तक रख पाएंगे ?

थ्योरी ऑफ़ डेवलपमेंट क्या है ? सिर्फ़ बड़ी – बड़ी सड़को और बिल्डिंगों का बन जाना ही ! सामाजिक स्तर पर मानव की सोच ही नहीं बदली फ़िर कैसा विकास ? कैसी आज़ादी ? सबसे ज़रूरी है सोच का बदल पाना ! उस सोच का विकास होना जिसमें पूरे समाज को सही नजरिये से देखने की , कुछ कर गुजरने , नहीं तो कम से कम अपने लेवल तक ही सही – ग़लत समझ और फ़िर सही के साथ खड़े होने की हिम्मत हो ! चार साल से भी कम उम्र थी भगत सिंह जी की जब उनसे पूछा की – पुत्तर ज़मीन में क्या बो रहे हो ? भगत बोले – बन्दूक, चाचा जी ! भारत माँ को आज़ाद कराने वास्ते ! और 23 साल 5 महीने और 26 दिन की उम्र वह दार्शनिक क्रान्तिकारी शहीद हो गया ! और आज हम सच बात कहने में ही घबराते है ! आखिर जब परिवार में ही सच नहीं कहा और सुना जायेगा ! फ़िर कहा ??

बारूद और अविश्वास के ढेर पर बैठी हुई दुनिया ! जिसमें एक मुल्क को दूसरें मुल्क पर विश्वास नहीं है ! एक प्रदेश को दूसरें प्रदेश पर ! और तो और अब परिवार में ही लोगों को एक दूसरें पर विश्वास नहीं है ! सारे रिश्ते- नाते बस महज एक खानापूर्ति के लिए निभाए जाने लगे है ! सबकुछ बस अब ख़ुद तक ही सीमित हो चला है ! क्षमा, दया, त्याग और सहनशीलता के बिना मनुष्य और जानवरों में क्या अंतर है ?  आज़ादी बहुत प्यारा शब्द है !

देश आज़ाद है ! पर उन व्यवस्थाओं से नहीं जो भ्रष्ट और खोखली है ! शिक्षा , स्वास्थ्य और कई बुनियादी चीज़ें आज तक हमें नहीं मिली है ! हम ही लोग व्यवस्था में जाते है और भ्रष्ट हो जाते है ! सबसे ज़रूरी है सोच में बदलाव ! फूल-पत्तियों से लेकर चिड़ियों-चीटियों तक सबको समान अधिकार देने का ज़ज्बा ही मानव को हरेक जन्तुओं से अलग और ख़ूबसूरत बनाता है ! दिलों में नफ़रत मत भरिये ! और जुबां से जहर मत उगलिए ! व्यवस्था को भ्रष्ट मत करिए ! सबको समान अधिकार दीजिये ! ज्यादा नहीं तो कम से कम किसी से दुर्व्यहार मत कीजिये ! असळ मायने में यही आज़ादी है !

आखिर में –
न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है
नहीं समझी गई ये बात तो नुकसान सबका है
जो इसमें मिल गईं नदियाँ वे दिखलाई नहीं देतीं
महासागर बनाने में मगर एहसान सबका है
अनेकों रंग, ख़ुशबू, नस्ल के फल-फूल पौधे हैं
मगर उपवन की इज्जत-आबरू ईमान सबका है
ज़रा से प्यार को खुशियों की हर झोली तरसती है
मुकद्दर अपना-अपना है, मगर अरमान सबका है
उदयप्रताप सिंह

 

इस उम्मीद … !

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पूरी रफ़्तार से चल रही ट्रेन के गेट पर खड़ी पत्नी ने पति से पूछा – मै इस ट्रेन से गिर जाऊं तो आप क्या करेंगे ? पास खड़े पति ने अख़बार का पन्ना पलटते हुए अनमने भाव से हंसकर कहा – समय आने पर देखा जायेगा !… और फ़िर पलटकर पति ने भी पत्नी से पूछा – अच्छा माना मै गिर जाऊं तो तुम क्या करोगी ? पत्नी ने पति को देखा और एक पल बिना सोचे मुस्कुराते हुए पति को बचाने के लिए ट्रेन से छलांग लगा दी ! यह पत्नी का उत्तर था !

कहने को महज़ यह एक लघु-कथा है ! कुछ बेशुमार बुद्धिमान लोगों को यह एक बेवकूफ़ी वाली बात भी लग सकती है ! पर असल में सीखने को इस कथा में प्यार , अपनत्व और त्याग की वह परिभाषा जो शायद हमारी उम्र पर बीत जाये पर हम कभी नहीं सीख पाए ! आप कह सकते है यह तो प्रेम का अतिवाद(माने बहुत ज्यादा- पागलपन वाला ) है कि कल्पना में किसी गिरे हुए पति को बचाने के लिए ट्रेन से छलांग लगा देना ! तो …

सूफ़ी संत रूमी लिखते है -अगर आप अतिवादी नहीं हैं, तो आप प्रेमी नहीं हो सकते। जो प्रेमी अतिवादी नहीं है, वह वास्तव में प्रेमी है ही नहीं। अगर कोई प्रेम को उसकी संपूर्ण तीव्रता में जानना-समझना चाहता है, तो उसे अतिवादी होना ही होगा। शांत और संयत किस्म का व्यक्ति कभी प्रेमी हो ही नहीं सकता। प्रेमी वही हो सकता है, जिसके भीतर जोश और जुनून सारी हदों को पार करता हुआ उमड़ रहा हो। बिना जुनून वाला प्रेम तो बेस्वाद और नीरस होता है। यह तो केवल एक लेन-देन है, एक-दूसरे की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए – प्रेम के नाम पर यही खेल खेला जाता है। अगर कोई अपनी परम प्रकृति तक पहुंचने के लिए अपनी भावनाओं को इस्तेमाल करना चाहता है, तो वे भावनाएं तीव्र होनी चाहिएं। साधारण भावनाएं आपको अपनी परम प्रकृति तक नहीं ले जा सकतीं।

खैर, इस प्रेम-ज्ञान की भयंकर बातों को छोड़कर जिनका इस socially-numb लोगों में कोई ख़ास मतलब भी नहीं  है ! मुद्दे की बात पर आते है ! WHO की रिपोर्ट बताती है हरेक साल पूरे विश्व में लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या करके अपनी जान दे देते है ! और अकेले अपने भारत में यही आकंडा हरेक साल कमोबेश डेढ़ लाख तक लोगों का है ! जिसमे लगभग चालीस हज़ार लोग फैमिली प्रॉब्लम की वजह से आत्महत्या करते है ! और NCRB- India के रिकॉर्ड के मुताबिक़ हरेक घंटे हिन्दुस्तान में एक स्टूडेंट आत्महत्या करता है यानी कमोबेश दस हज़ार स्टूडेंट प्रतिवर्ष !  और एक लाख महिलाओं में आत्महत्या करने के मामले में भारत विश्व में 6 रैंक पर है ! और यह आकड़ें बस जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है ! उन अनगिनत मामलों को छोड़कर जो न किसी के दिल में और न सरकारी कागज़ों में दर्ज ही नहीं हो पाते है !

मूल्यों , आदर्शों , परम्पराओं और फैमिली – वैल्यूज की दुहाई देने वाले भारत जैसे देश का जब यह हाल है तो बाक़ियों का क्या होगा आप समझ सकते है ! क्या वजह की कोई अपनी ज़िन्दगी ही ख़त्म कर लेता है ! अवसाद में था ! मेंटल वीक था ! प्यार में धोखा मिला होगा !  बैंकरप्सी हो गयी थी ! फ़ेल होने का डर था ! बस गिनी – चुनी इतनी ही वजह हम ज़रूरत से ज्यादा होशियार लोगों को समझ आती है ! हम कभी क्यूँ नहीं देख पाते है सिक्के का दूसरा पहलू ! और न देखना चाहते है कि जब अवसाद से शिकार किसी व्यक्ति को हमारी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी कि हम उससे बात करने के बजाय फेसबुकियाँ लोगों के साथ गोलगप्पे की दुकान ख़ोज रहे थे ! या इश्क़ में टूटे किसी बेटा/बेटी को समझने के बजाय हम उस पर चिल्ला रहे थे ! या फ़ेल/बैंकरप्सी में जी रहे किसी दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर यह कहने की बजाय की धैर्य रखो सब ठीक हो जायेगा हम उससे किनारा काटकर pout बनाकर किसी माल में सेल्फी खीच रहे थे ! और हा सनद रहे यहाँ मै आत्महत्या जैसे कृत्य को न तो वाज़िब मान रहा हूँ और न ही उसका समर्थन कर रहा हूँ !

एक्चुअली हमारी फ़ितरत ही यही है कि हमें बस अपना ही सब नज़र आता है ! अपना दुःख , अपना सुख ! बाकि किसी का कोई दर्द , शिकायत या तड़प हमारे लिए मायने नहीं रखती है ! लगभग घर-बाहर सभी जगह यही हाल है ! नवविवाहिता पर होने वालें जुल्म , बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार, अपने ही लोगों द्वारा मिलने वाली मानसिक प्रताड़ना ! शायद  घर-बाहर कही भी कोई किसी को समझने को तैयार नहीं है ! तो प्रश्न सिर्फ़ इतना ही है कि – जब कोई किसी को समझने के लिए तैयार ही नहीं है ! तो यह दुनियादारी क्यूँ ? गोलगप्पे खाने के लिए तो कोई भी मिल जायेगा किसी को भी रोड से पकड़ लो ! और हां आदमी भी गोलगप्पे खाने से निकले आसुओं को सच मानकर उसी के साथ हो लेता है ! जबकि शायद कोई जो उसे ढ़ंग से समझता है वह उसे कभी समझ ही नहीं पाता है ! यह कोई शिकायत नहीं है बस ढ़ोंग या दिखावा नहीं चाहिए !

एकांगी विचारधारा वाले लोग नहीं चाहिए ! वे पक्षी नहीं चाहिए जो पतझड़ में पेड़ छोड़कर उड़ जाते है ! वे कप्तान भी नहीं चाहिए जो डूबते जहाज को छोड़कर भाग जाते है ! और ऐसे किसी अपार्टमेन्ट में घर भी नहीं चाहिए कि जहाँ सेकंड फ्लोर पर प्यास से कोई मर रहा हो और थर्ड फ्लोर पर डीजे की तेज धुन में बियर पीते हुए लोग नागिन डांस कर रहे हो ! आप यहाँ मुझे क्रॉस कर सकते है कि कोई दूसरा क्या कर रहा उससे क्या लेना – देना है ! तो फ़िर मेरा प्रश्न वही है फ़िर यह सामाजिक संरचना जैसे भारी-भरकम शब्द क्यूँ बनाए गए है  ? आप यह भी कह सकते हो मेरी बहुत छोटी सोच है ! आपकी ख़ुशी होगी ! पर एक दिन जब कोई किसी को बात करने को नहीं मिलेगा ! तब दीवार पर सिर मारिएगा अपना और कहियेगा दूसरे से क्या लेना – देना !

शायद यह एंटी – सोशल है ! या बहुत ज्यादा अतिवादी ! या बहुत ज्यादा उम्मीद रखने वाला ! आपको जो भी समझना है आप अपने विवेक से समझ लीजिये ! पर socially – numb लोग नहीं चाहिए ! क्यूंकि हरेक आत्महत्या के बाद सिर्फ़ आदमी नहीं जाता है मानवता की वह सारी परिभाषाएं और मूल्य भी चले जाते है जो कहते है कि आदमी ही आदमी के काम आता है ! और अंतिम बात कोई आदमी आत्महत्या तब कर लेता है जब उसकी सामाजिक/परवारिक और सम्बन्धों की हत्या उसके अपने ही लोगों द्वारा पहले ही कर दी जाती है ! हो सके तो ऐसा होने से रोकिए ! स्वस्थ रहे – मस्त रहे !

आख़िर में –
मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
(प्रो. वसीम बरेलवी)

भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मूल्याङ्कन

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रचनाकार.ओर्ग पर प्रकाशित !

कहानी में हमेशा तीन पक्ष होते है – पक्ष , विपक्ष और सत्य ! इतिहास मनाव को अतीत की वास्तविकताओं का दर्शन कराता है , वैसे भी इतिहास का शाब्दिक अर्थ भी है – “ऐसा ही था ” या “ऐसा ही हुआ ”! भारतीय शिक्षा के इतिहास को मुख्यतः हम पांच भागों में बाँट सकते है !
1- वैदिक काल/Vedic Period – छह सौ ईसा पूर्व
2- बुद्ध काल/Buddhist Period – सन 600 से 1200 तक
3- मुस्लिम काल/Muslim Period – सन 1200 से 1800 तक
4- ब्रिटिश काल/British Period – सन 1800 से 1947 तक
5- स्वतंत्रोतर काल/After Independence Period – सन 1947 से अबतक

वैदिक काल की शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो इसमें व्यक्ति के अध्यात्मिक उन्नति पर ज्यादा जोर दिया जाता था ! शिक्षण काल में छात्र को सामाजिकता , विनम्रता , भद्रता , सहन-शीलता , सहकारिता आदि का पाठ काफी बेहतर ढंग से सिखाया जाता था ! “भिक्षाटन द्वारा छात्रों को विनय का पाठ पढ़ाना” , संभवतः विश्व इतिहास का एकमात्र दुर्लभतम उदहारण है !

उसके बाद आयी बुद्ध काल की शिक्षा प्रणाली वैदिक काल से मात्र इतना भिन्न थी कि इसमें अध्यात्मिक उन्नति पर ज्यादा जोर न देकर नैतिकता तथा शील पर ज्यादा जोर दिया गया ! नैतिक चरित्र के साथ दैनिक जीवन में मधुर व्यवहार , अच्छा आचरण , निष्ठा छात्रों को ढंग से सिखया जाता था ! नालंदा (सन 425 से सन 1205 ) बुद्ध काल की शिक्षा का गौरव रहा !

फिर उसके बाद मुस्लिम काल में मुस्लिम संस्कृति के आधार पर अरबी , फारसी और बाद में उर्दू की शिक्षा दी गयी ! यह काल medieval period के नाम से भी जाना गया !

मुग़ल वंश का अंत होते – होते अंग्रेजी हुकूमत चलने लगी ! और भारतीय शिक्षा अब अंग्रेजो के हाथ में चली गयी !
1835 में लार्ड टी . बी . मैकाले साहब आये और उन्होंने कहा की –
“A single shelf of a good European library was worth of the whole native literature of India & Arabia ”.
अब चूंकि हम भारतीयों के लिए अंग्रेजी में लिखा परचून की दूकान का हिसाब भी बड़ा साहित्य होता है ! अच्छा अंग्रेजी से हम सबका रिश्ता भी हमेशा सौतेली माँ वाला रहा ! प्यार पाना चाहा तो बहुत , मगर मिला नहीं ! लेकिन फिर भी मैकाले साहब का स्टेटमेंट सुनते ही हम सब , अपने भारतीय ज्ञान को गंवार , निष्कृष्ट और विज्ञान विहीन बताकर/समझकर हम वैज्ञानिक बनने चल पड़े !
साफ़ शब्दों में कहूँ तो उनकी फैक्ट्री में मजदूर बनने भर की शिक्षा लेने लगे ! और यही से एक अजीब सी मानसिक गुलामी का दौर शुरू हो गया !

खैर , काफी संघर्षों के बाद 1947 में हमें अंग्रेजों की हुकूमत से तो आजादी मिली , पर मानसिक गुलामी से आजादी नहीं मिली !
शिक्षा व्यवस्था में ताबड़तोड़ बदलाव किये गए ! जहाँ लिखना था –
“नवगति , नवलय , ताल छन्द नव
नवल कंठ , नव जलद मंद्र रव
नव नभ के नव विहंग वृन्द को
नव पर , नव स्वर दे ! ( महाप्राण निराला ) ”
वहां – “jhony – jhony ! yes papa , eating sugar no papa !” लिखा गया ! यह आँख मूंदकर दूसरों को ही सही मानने और अपने / अपनों पर भरोसा न होने का नायाब नमूना था (है) !

नतीजा , यह हुआ की शिक्षा व्यवस्था जन-मानस से कटती गयी ! नकली ज्ञान केंद्र (कोचिंग – सेण्टर ) , हरेक नुक्कड़ पर पान की ढाबली की तरह खुले निजी पब्लिक/कान्वेंट स्कूल , जिनमे न अच्छे अध्यापक है न अच्छी सुविधाएँ शिक्षा व्यवस्था का बेडा-गर्क करने पर तुलें है ! एक बात यह भी है की जो लोग “हाई-मोस्ट” फीस लेने के बाद अपने ही नन्हें बच्चों के यूनिफार्म से लेकर कॉपी-पेंसिल में भी कमीशन खाते हो ! वह भला कौन सी शिक्षा देंगे आप बेहतर समझ सकतें है (?)!

सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है ! मध्यान्ह भोजन , फंडामेंटल राईट ऑफ़ एजुकेशन , फ्री एजुकेशन , छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएँ यहाँ बस मजाक बनकर रह गयी है ! और सही भी प्रत्येक छात्र को सिर्फ चार रुपयें में कोई अध्यापक कैसे २०० मिली . मिल्क और तहरी उपलब्ध कराएँ ? अध्यापक को सरकार हमेशा गैर – शैक्षणिक कार्यों में ही जोते रहेगी तो वह पढ़ाएंगे कब ? महिला अध्यापिकाओं की जरूरतें और सुरक्षा पूरी करने में प्रदेश / देश की सरकार बिलकुल ही असमर्थ है ! महिला अध्यापिका की कमी के कारण ही 11 वर्ष से 17 वर्ष की अधिकांश लड़कियां घर पर रोक ली जाती है ! इस तरह सेकेंडरी/हायर एजुकेशन में बहुत कम लड़कियां ही पहुच पाती है , खासकर , गाँव की बच्चियों की शिक्षा तो रुक ही जाती है ! तो कुल मिलकर टोटल गेन यहाँ भी “निल-बटे-सन्नाटा” ही है !

देश में लगभग 16000 अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान है जिनकी स्थिति दयनीय है ! सरकारी विद्यालयों में 25 % से भी अधिक अध्यापक प्रतिदिन अनुपस्थित रहते है ! यह भी ख़राब शिक्षा का एक प्रमुख कारण है ! शिक्षक को भी अपना मूल्यांकन करने की जरुरत है ! महाभारत में कहा गया है कि –“गुरुगुर्रुत्मो धाम:” यानी गुरु मनुष्यत्व से देवत्व की ओर ले जाता है ! तो महज ‘छात्र सुनते ही नहीं’ कहने से आपके कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाएगी ! हमारी संस्कृति में सम्मान जनरल स्टोर पर नहीं मिलता , उसे अर्जित करना पड़ता है ! शिक्षक को छात्र से सम्मान चाहिए तो पहले उसे अपनी आचरण की शुद्धता का उदहारण रखना होगा ! समय के पाबंद , विद्वान , विनम्र और अनुशासित शिक्षक की अवहेलना छात्र कर ही नहीं सकता है !

चिली(96.2% लिटरेसी-रेट),मलेशिया (95%),श्रीलंका (91%) जैसे छोटे विकासशील देश जब अपने शिक्षा बजट को बढ़ाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था सुधार सकतें है ! तो आखिर हमारी सरकारें क्यूँ इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती है ? और समाज भी जो हरेक मुद्दें पर सड़क पर उतर आता है ! आखिर कब गुणवत्ता वाली शिक्षा , समान शिक्षा के लिए एकजूट और जागरूक होकर आवाज उठाएगा ! हमें(समाज) खुद भी अपने चरित्र पर सोचने की जरुरत है !

एक छोटा सा ईमानदारी से किया गया प्रयास (टीचर + गवर्नमेंट + पेरेंट्स द्वारा) प्राइमरी / सेकेंडरी एजुकेशन सिस्टम को सुधार सकता है ! हायर एजुकेशन में तो कॉलेज अपने बलबूते पर ही बहुत कुछ अच्छा कर सकता है ! बस इनके प्रोफेसर को डिपार्टमेंटल पॉलिटिक्स और स्टूडेंट्स को क्लास पॉलिटिक्स कम करना होगा ! लेकिन ??? बस इतना ही कहना चाहूँगा –“खुद को जख्मी कर रहें है , गैर के धोखे में लोग …..!”

यहाँ हमें शिक्षा में भौतिक उन्नति के साथ – साथ अध्यात्मिक उन्नति पर भी बल देना होगा ! जिससे छात्र चरित्रवान , स्वस्थ्य और धैर्यवान बने ! छात्र नफरत , घृणा , बैर , अहंकार , और आत्महत्या की तरफ जाने के बजाय प्रेम , सृजन , कल्याण का चयन करें ! एक ऐसी शिक्षा प्रणाली जिसमे छात्र को टारगेट अचीव करने वाला निर्जीव रोबोट न बनाकर !मेहनत , प्रेम और करुणा रखने वाली मानवीय आत्मा समझा जाये ! जहां केवल उनकी उपलब्धियों से नहीं , उनकी मानवता से भी उनकी क़द्र हो !

आँख मूंदकर विदेशी विचारों को छात्रों पर आरोपित न किया जाये ! हमें अपनी आंतरिक स्थिथि का ठीक से जायजा लेकर अपनी पुस्तकों को समाज से जोड़ना होगा ! कुछ याथार्थ चिंतन शामिल करने होंगे अपने पाठ्यक्रम में ! जिससे छात्र अपने अतीत , वर्तमान और भविष्य से जुड़ सकें उनको जान सकें ! बापू ने कहा है – “संवेदना विहीन विज्ञान सामाजिक पाप है !” और विनोवा ने भी कहा है की –“वह ज्ञान जिसमे आप अपनों के साथ हंस न सकें , उनके दुखों को न महसूस न कर पाए ! अज्ञान से भी बदतर होता है !”

बिना तर्क की कसौटी पर कसे ही अपने भारतीय ज्ञान ,विचार ,पद्धति को नकार देना कोई होशियारी नहीं है ! एनसीआर में रह रहे आपके भाई के बच्चें या आपका ही बेटा / बेटी आपको गाँव से आया आश्रित और पुराने ख्यालात का आदमी समझे ! पोस्ट – ग्रेजुएशन कर रहे लोग एक-दुसरें के लिए अथाह नफरत लेकर जीते हों ! और जब प्यार , सवेंदानाएं , अपनापन सब कुछ “सेलेक्टिव ” हो जाये , साधारण शब्दों में कहूं तो बनावटी और फर्जी हो जाये ! तो शिक्षा का फायदा क्या है ??? और आप लोग ज्ञान के विकास का दंभ पाले बैठे रहो !

कथा है की – एक बार , एक शिष्य ने अपने गुरु से पूंछा की – गुरुवर आप सारे संसार को मेहनत का सन्देश देते है ! करुणा का सन्देश देते है ! प्रेम का सन्देश देते है ! इससे क्या लाभ है ? गुरु ने शिष्य के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया ,बल्कि शिष्य का हाथ थामा और एक ऐसी जगह ले गया जहा दूर – दूर तक केवल रेत ही रेत बिखरी पड़ी थी ! गुरु ने शिष्य से कहा – पुत्र , आज शाम तक तुम इस रेत से एक प्रतिमा (मूर्ति) बनाकर आश्रम ले आना फिर मै बताऊंगा की मै पूरी दुनिया को मेहनत , प्रेम और करुणा का सन्देश क्यूँ देता हूँ ?

शिष्य प्रतिमा बनाने में जुट गया ! वह बार – बार रेत को इक्कठा करके प्रतिमा बनाने की कोशिश करता पर रेत बार – बार बिखर जाती ! ऐसा करते – करते उसके माथे पर पसीने की कुछ बूंदे आ गयी ! आज्ञाकारी शिष्य था , सोचा की गुरुवर के आदेश का पालन नहीं कर पाया हूँ ! तो आँखों में आँसू भी आ गये ! पसीने की बूँद और आँखों के आँसू जब हथेली पर गिरे तो हाथों में लगी रेत कुछ गीली हो गयी !

शिष्य समझदार था वह गुरु के पास अपने प्रश्न का उत्तर जानने नहीं गया , बल्कि दुनिया वालों के पास गया और कहा की – हमारा जीवन एक सूखी मिट्टी की तरह है ! अगर इसमें माथे पर मेहनत के पसीने की बूंदे नहीं , आँखों में करुणा के आँसू नहीं , ह्रदय में प्यार की छलकन नहीं तो बाकी सब कुछ होते हुए भी यह बेकार है !

आप भी इस कथा का मर्म समझिये और अपने बच्चो को भी समझिए ! यही असली शिक्षा के मायने है और शिक्षित-जीवन का सत्य !
आखिर में-
कविता शब्दों की अदालत में !
अपराधियों के कटघरे में !
खड़े किसी निर्दोष आदमी का हलफ़नामा है !!(धूमिल)

प्रेम न जानत कोय !

love

रचनकार.ओर्ग पर प्रकाशित !

क्या लिखूँ ? वह भी प्रेम पर ! जिस पर न जाने कितने वर्षों से , न जाने कितने लोगों ने , न जाने कितना कुछ नहीं लिखा ! संत-असंत , नर-नारी , ज्ञानी-अज्ञानी ,ज्ञात-अज्ञात ,जन्मा-अजन्मा सबने तो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से प्रेम का दर्शन कराया !

फिर चाहे मीरज़ापुर की कजरी हो -” अरे रामा पेंग बढ़ावें राधा प्यारी , पिया को लागी प्यारी री होरी !” या फिर बहराइच का लोकगीत -” अमावू बौरी -बौरी आवें ,बसावू बासुरी बजावें ,जियरा डोलि-डोलि जाय !” या फिर पूरे अवध में होली में गया जाने वाला फाग हो -“समय पर फगुवा खेलें भवानी ….!”

या सूरदास का वात्सल्य का शिखरस्थ पद – “जसोदा हरि पालनैं झुलावै , हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कुछ गावै ! ” या फिर मीराबाई का अथाह वियोग में डूबा पद – ” हेरी म्हां दरदे दिवाणी , म्हरा दरद न जाण्यां कोय ! ” या रसखान का भक्ति का सर्वोच्च पद -” काग के भाग बड़े सजनी , हरि हाथ से ले ग्यो माखन रोटी !’ इन सब में तो प्रेम का अनूठा अहसास छुपा है !

फिर क्या कारण है कि आज प्रेम महज एक मजाक का विषय बन कर रह गया है ! कबीर ने जिस ढाई आखर वालें प्रेम को जानने वालों को ‘पंडित’ कहा ! आज वह प्रेम परिजनों से विद्रोह से शुरू होकर ,खाप पंचायतों के रास्ते हॉनर किलिंग में बदल जाता है ! या फिर कोर्ट-मैरिज के रास्ते से डाइवोर्स , सुसाइड , एसिड-अटैक , MMS के रूप में दुनिया के सामने आता है !

वजहें गिनाने को तो बहुत हो सकती है पर हमे अनुभव(experience) और अनुभूति(realization) में फर्क सीखना होगा ! अनुभव के आधार पर आप कह सकते है कि सिंगल-फैमिली , पेरेंट्स के झगड़े , उनका बिजी शेड्यूल और संसधानो का इतना सुलभ होना इस “आज कोई-कल कोई और” वाले प्रेम का जिम्मेदार है ! पर अनुभूति के आधार पर मै कह सकता हूँ – हमारी पीढ़ी के सामने महज दूषित-प्रेम की परिभाषाये प्रस्तुत की गयी ! नतीजा हमने ‘दैहिक -प्रपंचो ‘ मे ‘वास्तविक -प्रेम ‘ खो दिया ! ठीक उसी तरह जैसे हमने ज्ञान मे से प्रज्ञा खो दी , और सूचनाओं में से ज्ञान खो दिया !

हम अपने को और अपने लोगों को प्रेम के उच्चतम आदर्शो जैसे -राम ,कृष्ण,नानक ,बुद्ध ,महावीर आदि के बारे में कभी सीखा ही नहीं पाये ! राम मर्यादा के प्रतीक पुरुष है और गंगा भारतीय अस्मिता की ! और कृष्ण जो सबको दीवाना बनाते है ! चक्र धारी होने पर भी कृष्ण का नाम लेने पर बासुरी नज़र आती है ! वही है जिनके पास मीरा भी है ,और महाप्रभु चैतन्य भी ! और जो माँ यसोदा के साथ वात्सल्य की वह अनुपम बाल लीला रचते है ! जो नास्तिको को भी सम्मोहित कर दे ! और जो राधा के साथ ऐसा मोहक संसार रचते है कि याद ही नहीं रह जाता है कि राधा आयु में उनसे बड़ी है और उनकी संबंधी भी है ! यहप्रेम का सच्चा स्वरूप है !

आज जब लड़को को उनकी सातवी गर्लफ्रेंड के चौथे बर्थडे पर उसकी ही कजिन से सेटिंग बनाते देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या वाकई प्रेम अँधा ही होता है ? या Francis Bacon साहब ने सही ही लिखा है “it is impossible to love, and to be wise.(from ‘of-love’ essay) !” प्रगति की अंधी दौड़ ,पश्चिमी देशों के अंध–अनुकरण और फिल्म-मेकर ने हमसे हमारे मूल्य ही छीन लिए ! हमें समझाना होगा की यह रोज-डे ,पर्पस-डे ,चॉकलेट-डे आदि -आदि उन लोगो द्वारा फैलाये गए चोचले है जो जो नकली गुलाबों , चॉकलेट ,टेडी-बियर ,और बियर का धंधा करते है ! यहाँ मै एक बात और कहना चाहूंगा की अभिभावकों को भी अपना स्व-मूल्याङ्कन करने की जरुरत है !

पर पीवीआर में बैठकर चवन्नी का चॉकलेट खाने वालें प्रेमी-युगलों कभी तुम्हे ग्रैंड -मस्ती ,हंटर ,या क्या सुपर कूल है हम-३ जैसी फ़िल्में देखने से फुरसत मिले या फेसबुक पर अपनी तथाकथित प्रेमी/प्रेमिकाओं से चैटियाते-चैटियाते बोर हो जाओ तो गूगल बाबा की शरण में जाकर जय शंकर प्रसाद की कहानी ” पुरूस्कार” या चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी ‘ की कहानी “उसने कहा था ” पढ़ लेना ! और गर समझ भी गए तो तुम्हारे दिमाग से ये ‘लाइन मारना ‘,’सेटिंग बनाना ‘ या ‘ बड़ा कंटॉप माल है ‘ जैसे शब्द हमेशा के लिए फॉर्मेट हो जायेंगे ! तब तुम्हे पता चलेगा आखिर प्रेम होता क्या है !

प्रेम के उन मूल्यों को खोजिए जिसमे ठहराव , भरोसा , संयम और चरित्र हो ! आपका प्रेम न तो इतना हल्का होना चाहिए की बीबी , बहन या गर्लफ्रेंड का फ़ोन बिजी जाने पर टूटने लगे ! और न ही इतना सस्ता की उसमे हर कोई आ जाये ! प्रेम सत्य ,सहज,सरल और जन- कल्याणकारी होना चाहिए !

कथा है की – एक राजकुमार ने बलपूर्वक किसी दूसरे देश के राजा को हराकर उसकी बेटी(राजकुमारी) का हरण कर उसे रानी बना लिया ! राजकुमारी ने कहा -राजकुमार ! तूने बल से मेरा तन भले ही हरण कर लिया हो ,पर तू मेरी आत्मा कभी नहीं जीत पायेगा ! राजकुमार ने उस दिन प्रण लिया , और अपना कोई दूसरा विवाह नहीं किया ! नहीं राजकुमारी को कभी हाथ लगाया , वो दोनों शयन -कक्ष में जब सोतें तो राजकुमार मध्य में अपनी तलवार रख देते ! और लगभग ६० वर्ष बाद एक दिन रानी ने वह तलवार उठकर फेंक दी ! और राजन से कहा – प्रिये ! आपके संयम ने मेरी आत्मा जीत ली ! चलो , आज मै आपकी अर्धनगिनी बनकर आपके साथ यज्ञ करुँगी ! और दोनों ने साथ में हवन -पूजन किया , और उसी दिन राजन ने वैराग्य धारण कर लिया !

कहने को तो यह महज एक पौराणिक कथा है पर सीखने में शायद आपका जीवन बीत जाये और आप इस कथा का मर्म न समझ पाएं ! सोचिये , कोशिश कीजिये ,अच्छा करने की ,अच्छा बनाने की ,और अच्छे लोगों चुनने की !
आखिर में –
प्रेम धर्म का पर्याय है !
प्रेम असीम है ,अनंत है !
बंधन – मुक्त
एक छोर से दूसरे छोर तक
अतृप्त मानवता
छोर की तलाश में प्रयासरत है !
तलाश रही है उस छोर को
जहा आदि और अंत का एक रूप है ! (अज्ञात)

जवाबी कीर्तन – लोक संगीत

 

jabavi

 रचनाकार.ओर्ग पर !

वो गीत जो तुमने सुना ही नहीं , मेरी उम्र भर का रियाज था !
मेरे दर्द की थी वो दांस्ता , जिसे तुम हंसी में उड़ा गए !!शायर अहमद फ़राज ‘अहमद ’ का यह शेर , ‘उत्तर-प्रदेश’  की एक अनूठी , बेमिशाल परन्तु गुमनाम लोक-साहित्य की विधा “जवाबी –कीर्तन “ की दशा पर सटीक बैठता है !

जवाबी कीर्तन यानी विशुद्धसाहित्यिकमनोरंजनप्रतियोगिता ! कथाए बताती है की – इस लोक-गायन की विधा का जन्म हुआ जब एक बार हनुमान जी राम-कथा और बाबा सूरदास जी कृष्ण–कथा , कई दिनों तक अनवरत गाते रहे ! वही से ऋषियों – मुनियों ने इस परम्परा की शुरुवात मानी ! वर्तमान में उत्तर – प्रदेश के बहराइच , बलरामपुर , लखीमपुर ,सीतापुर , हरदोई , सुल्तानपुर ,लखनऊ और कानपुर तथा मध्य-प्रदेश के कई जिलो – छतरपुर ,सतना आदि में आज भी यह विधा गायी जाती है ! दार्शनिक विषयों , पारंपरिक कथाओं , सामाजिक –कुरीतियों को गीतों में पिरोकर गानें वाले इसके कलाकार त्वरित ही मंच पर अपना गीत गाते है ! और विपक्षी – पार्टी के गीत का जबाव भी तुरंत लिख कर देते है ! आप कल्पना भी नहीं कर सकते है कि अगर किसी कलाकार (जवाबी की भाषा में –पार्टी )ने अगर दूसरी पार्टी के गए गीत का जबाव अच्छा नहीं दिया ! तो सामने बैठी 2-3 हजार जनता और दूसरी पार्टी क्या जबरदस्त हूटिंग करती है ! और लगभग 10 घंटे तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में एक पार्टी विजयी घोषित होती है ! यानी मै दावे से कह सकता हूँ कि लोक-साहित्य की सबसे कठिन विधाओं में यह एक है !

जवाबी के बेहद – खूबसूरत गीत , जिनमें शब्द-चयन , काव्य –सौंदर्य द्रष्टव्य है ! फिर चाहे दार्शनिक अंदाज में लिखा लखनऊ के शोला ‘शबनम’ का गीत –
अरे ! बोल मछरिया बोल मछरिया कित्ता पानी है !
कितने जाल मछेरे डाले , कितने मिले पराये अपने !
तुझे पता घाटघाट में एक वित्ता पानी है ! ” जिसमे संसार को तालाब और जीव को मछली से संबोधित किया गया है ! सच में कितने अपने–पराये निकले , और पराये-अपने मिले !
या जिन प्रभु श्री राम पर लोग महिला –विरोधी होने का तमगा लगा देते है ! वे राम जब हनुमान जी द्वारा लंका से लायी माँ सीता की ‘चूड़ामडी’ को देखते है तो विलख –विलख कर रोते है ! गोंडा के कीर्तनकार नादान ‘किंकर’ इस मनोभाव को कुछ यूँ लिखते है –
दुसह दुःख दारुण , कहे का हिया का !
विजय भानु भूषण ,विभूषण सिया का !
लखन लख के पायल , लगे प्रभु को लखनै !
लखन को लखा तो लगे प्रभु विलखनै  !
हनुमान की मूक बानी पे रोये ….!
रमापति रमा की निशानी पे रोये …!

और यही राम जब मरणासन्न “जटायु ” को गोद में लिए बैठे है तब –
विहग वेदना ना छिपी विकल रघुवीर से !
उसको नहलाते नवल नयनो के नीर से !
धीरज बढ़ने वाले दिखतें अधीर से !
सारा जग चकित है इस पक्षी की तकदीर से !

ऐसे है राम ! यकीन मानिये अमरनायक – महानायक श्री राम ने अपना सारा जीवन ही दूसरों की ख़ुशी के लिए न्योछावर कर दिया ! कम से कम उनकी आलोचना करने से पहले उनके जीवन का मर्म समझिये तो एक बार !
इसके अलावा वर्तमान सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार में भी अपना संयम बनाये रखने की हिम्मत देने वाला कानपुर  के जवाहर जिद्दी का यह गीत अपने आप में एक लैंडमार्क है –
स्वारथ में रत हो गोदी के बेच ललन तक लेते है !
ऐसे है कुछ मुर्दों तक के बेच कफ़न तक लेते है !
सुनी होगी बिकने की तुमने कहानी , काशी में बिक गए हरिश्चंद्र दानी !
बिके ये दुनिया पर मान न बिकेगा , कट जाये बोटी बोटी सत्य ईमान न बिकेगा !
पुतले बिकते होंगे पर वो भगवान न बिकेगा ,बिके ये दुनिया ……..!

जवाहर ‘जिद्दी’ अपने साज और शब्द चयन के लिए बहुत प्रसिद्ध थे ! इन्होने एक बाप जब अपनी बेटी को विदा करता है तो उसे बिटिया कैसी लगती है ! कुछ यूँ लिखा  –
ममता सी , रमता सी , समता सी , देवताओं की असीसी !
सत्यता सी , भव्यता सी , दिव्यता सी , सभ्यता सी !
खिली रहे पूर्णमासी सी , सुखी रहे सुखरासी सी !!

यह एक पिता का नजरिया था ! पर वही बेटी जब ससुराल जाती है तो पति का नजरिया देखे –
कमला सी , नवला सी , चपला सी , विमला सी !
और मुख पर है चन्द्र हंसी सी !
रूप भरी है शीशी , यानि रम्भा , सिया उर्वशी सी 

कुछेक और गीतों में जैसे  नादान किंकर का गीत – जब गोपियाँ कृष्ण को माखन चरते हुए पकड़ने के लिए घंटियाँ लगा देती है जहा माखन रखा ! पर कृष्ण ऐसी माया रचते है की गोपियों को लगता है की हवा से घंटी बज रही है ! और वह माखन ले कर के चले जाते है ! इस गीत में कई ऐतिहासिक जगहों के नाम ऐसे प्रयोग हुए है –
जंतर मंतर पल में , लाल के लाल के छल में !
यदुकुल ताज महलमें , कि बंद बुलंद दरवाजा!
घंटा घर घर बजा , पकड़ ना आया रे …!
अरे भूलभुलैया बनवारी की माया रे …….! इस गीत को आप ‘लाल चुनरिया वाली पर दिल आया रे’ की तर्ज पर गुनगुना कर देखे फिर आपको इसके सौन्दर्य का अंदाजा होगा !
इसी क्रम में अगर मै लखनऊ के दादा स्व . अमर लखनवी ‘ का जिक्र न करूं तो जवाबी -कीर्तन पर की गयी कोई भी बात अधूरी है ! इनको जबावी का ‘भीष्म-पितामह’ माना जाता है ! आपने सुनने में सरस , पर दुसरें कीर्तनकार को जबाव लिखने में छठी का चावल याद दिला देने वाले गीत लिखते थे ! क्योकि भैया ! जबावी , तो जबाव की होती है ! इनके गीतों के कुछ नमूने पेश है –
पत्थर के भगवान, कलयुग के दरम्यान , कहलाये पत्थर के सनम !
पत्थर के शिव महान , शिव सर्वशक्तिमान , सत्यम शिवम् सुन्दरम !
कि पारस पत्थर से लोहा भी सोना हो गया , पत्थर से प्रभावित कोना कोना हो गया !
पत्थर भी पानी पर तैरने लगे , श्री राम नाम का असर करने लगे !
पत्थर के सालिग्राम , शिवलिंग भी तमाम , पत्थर के रामेश्वरम !
पत्थर के राधाकृष्ण है लक्ष्मी गणेश है ! पत्थर में देवी देवता करते प्रवेश है !
पत्थर की पिंडियाँ तीन महादेवियाँ(माँ वैष्णो देवी) , अमर सदा बन्दे मातरम
रामेश्वरम हो या मन कामेश्वरम …. पत्थर के भगवान…………………………..! 
यह इनके एक बड़े गीत का छोटा सा अंश है ! आप सोचिये इस गीत का कोई कलाकार क्या जवाब लिखेगा ! आपके गीतों में अलंकार , रस , और प्रायः एक ही शब्द हरेक पंक्ति में आता है ! यह आपकी विशेषता है ! आपकी लिखी गणेश-वंदना अवध में घरों में गयी जाती है –
अग्र आराधना आपकी है ! सिद्धि ये साधना आपकी है !
शिवललाय नमः , गजमुखाय नमः , श्री गणेशाय नमः !
भाव में भावना आपकी है ! पूज्य प्रस्तावना आपकी है !
शिवललाय नमः , गजमुखाय नमः , श्री गणेशाय नमः !
हे गणपति हे गजानन !! हे गजतनहे गिरिजानंदन !
हे आशुतोष के ललन ! है आपका अभिनन्दन !
आइये अर्चना आपकी है ! सर्व प्रथमप्रार्थना आपकी है !
शिवललाय नमः , गजमुखाय नमः , श्री गणेशाय नमः

ऐसे ही न जाने कितने जवाब कीर्तन में गाये गए अनमोल लोकगीत/गीत , और इसके कीर्तनकार जैसे – मातादीन विश्वकर्मा ‘सरस’(छतरपुर , म०प्र० ) , बाबूलाल राजपूत (म०प्र० ) , कल्पना दुबे (म०प्र०) , राखी आजाद (जालौन , उ०प्र० ) , अजय ‘विजय ‘(जालौन , उ०प्र० ) , गुडिया भारती (कानपुर ,उ०प्र०) , लालमन चंचल (कानपुर उ०प्र०) , शंभू ‘हलचल ‘(कानपुर उ०प्र०) , रोशनी अन्जान (लखनऊ , उ०प्र०) , पागल सुल्तानपुरी (सुल्तानपुर ,उ०प्र०) , शशि राजकमल (रायबरेली , उ०प्र० ) , राजकमल ‘खुरपेंची’(बाराबंकी , उ०प्र०) , हरीश ‘मधुकर’ (बहराइच , उ०प्र०) , कुंवर ‘झनकार’(बहराइच , उ०प्र०) ,रामकरण मिश्र ‘सैलानी ‘(बहराइच , उ०प्र०), और न जाने कितने , जिनके नाम मुझे नहीं पता है , इस दम तोड़ रही परम्परा को जीवित रखने में लगे हुए है !

खैर , सिर्फ जवाबी -कीर्तन  ही क्यों ? उत्तर प्रदेश में तो नौटंकी , आल्हा , कजरी और रास जैसी लोक-साहित्य की परम्पराएँ भी तो गुम होती जा रही है ! वैसे भी हमारी तो जैसे फितरत सी हो गयी है ! भूल जाने की , भूला देने की ! अपना पहला प्यार- जरा सा कष्ट आने पर , माँ-बाप का संघर्ष – जरा सा बड़े हो जाने पर , प्राइमरी के मास्टर जी जिनसे  “अ” लिखना सिखा- जरा सा पढ़ जाने पर , पत्नी के सक्रिफ़िएस – जरा सा गुस्सा होने पर , भाई का दुलार- जरा सी ज़मीन के लिए , बहन का प्यार – जब वह अपने मन से जीना चाहती थी , वह रिक्शावाले अंकल – जो तुम्हे रोज स्कूल ले जाते थे ! और वह दोस्त – जिसे तुम कभी समझ ही न पाए !
सबको भुला दिया हमने ! तो लोग जब इतना सब-कुछ अपनी एक छोटी सी कभी भी ख़त्म हो जाने वाली जिन्दगी में ही भूल जाते है ! तो यह लोक-परम्पराए क्यों याद रखंगे जिसे तो पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजना  पड़ता है ! बच्चों को सिखाना पड़ता है ! पर इस युग में जहाँ आगे जाने की अंधी दौड़ हो , जब रिश्तें-मर्यादाएं तार-तार हो रही हो , कौन सहेजेगा इन गुम हो रही लोक-परम्पराओं को ………..???
आखिर में –
हाँ , अगर हो सके तो बगल से गुजरते हुए आदमी से कहो
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था !
इस वक़्त इतना ही काफी है !!-(धूमिल)

प्रेम की भाषा

किसी बंजर सी ज़मीन पर
उगा कोई नन्हा सा पौधा
हमें सिखाता है प्रेम की भाषा
कि जब धूप में सूख चूका हो कोई
कैसे उसके चेहरे पर मुस्कान बनकर खिलों
और उसे दो जीने का नया सलीका
पर इस नन्हें से पौधे से हमने कितना सीखा ?